Monday, 14 July 2014

बेटों की चाह है तो पहले बेटियाँ बचाओ

            बालिकाओं की गिरती संख्या के नियन्त्रण हेतु सरकारी तथा गैर-सरकारी क्षेत्रों से लगातार कदम उठाये जाते दिखते हैं किन्तु इसके बाद भी आशातीत परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। गर्भ में बेटियों को मार डालने की कुप्रवृत्ति के साथ-साथ लगभग प्रति मिनट की दर से किसी न किसी महिला को शारीरिक शोषण का शिकार बनाया जाना, अकेली महिला के साथ बलात्कार, सामूहिक बलात्कार की घटनाएँ, बाल यौन शोषण की घटनायें आम होती जा रही हैं। महिलाओं, बच्चियों की खरीद-फरोख्त, उनको देह व्यापार हेतु विवश करना आदि ऐसी स्थितियां हैं जो महिलाओं की गिरती स्थिति को दर्शाती हैं। वेश्यावृत्ति के अतिरिक्त विवाह हेतु महिलाओं-लड़कियों की खरीद-फरोख्त भी की जा रही है। इसके उदाहरण हमें आसानी से हरियाणा, चण्डीगढ़, पंजाब, पूर्वी उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि में देखने को मिलते हैं। हिमाचल प्रदेश सहित देश के अन्य भागों में बहुपत्नी प्रथा भी देखने को मिल रही है। ऐसा किसी प्रथा अथवा संस्कार के कारण नहीं अपितु महिलाओं की कमी के कारण हो रहा है। महिलाओं की संख्या में कमी आने का मूल कारण बेटियों का जन्म न होने देना है। आज भी समाज में बहुतायत में कन्या भ्रूण हत्या के मामले देखने में आते हैं। कन्या भ्रूण हत्या की विभीषिका को जनसँख्या सम्बन्धी आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है।
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            2011 की जनगणना के आँकड़े बेटियों के प्रति हमारी मानसिकता की कहानी अलग रूप में बयान कर रहे हैं। 2011 की जनगणना में प्रस्तुत किया गया कि 2001 की जनगणना की तुलना में 2011 में महिलाओं की संख्या बढ़ी है। यह सत्य भी दिखता है क्योंकि 2001 में प्रति एक हजार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की संख्या 933 थी जो 2011 में बढ़कर 940 तक जा पहुंची। यह आंकड़ा एक पल को भले ही प्रसन्न करता हो किन्तु इसके पीछे छिपे कड़वे सत्य को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। 2001 की जनगणना में छह वर्ष तक की बच्चियों की संख्या 927 (प्रति हजार पुरुषों पर) थी जो 2011 में घटकर 914 रह गई है। यही वो आंकड़ा है जो हमें महिलाओं की बढ़ी हुई संख्या पर प्रसन्न होने की अनुमति नहीं देता है। सोचने की बात है कि जब इस आयु वर्ग की बच्चियों की संख्या में बढ़ोत्तरी नहीं हो सकी है तो महिलाओं की संख्या में इस वृद्धि का कारण क्या रहा?
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            यदि 2011 की जनगणना के आँकड़े बच्चियों के संदर्भ में देखें तो उनके भविष्य के प्रति एक शंका हमें दिखाई देती है। 2001 की जनगणना में जहां देश के 29 राज्यों में शून्य से छह वर्ष तक की आयुवर्ग की बच्चियों की संख्या 900 से अधिक थी वहीं 2011 में ऐसे राज्यों की संख्या 25 रह गई। राज्यों में बच्चियों के प्रति सजगता की स्थिति यह रही कि मात्र आठ राज्य ही ऐसे रहे जिनमें बच्चियों की संख्या में 2001 के मुकाबले 2011 में वृद्धि देखने को मिली। इनमें भी चार राज्यों में बच्चियों की संख्या 900 के आँकड़े को छू भी नहीं पाई। पंजाब (798 से 846), चंडीगढ़ (845 से 867), हरियाणा (819 से 830), हिमाचल प्रदेश (896 से 906), अंडमान-निकाबार (957 से 966), मिजोरम (964 से 971), तमिलनाडु (942 से 946) तथा गुजरात (883 से 886) में ही वृद्धि देखने को मिली शेष सभी राज्यों में शिशु लिंगानुपात में कमी ही देखने को मिली है। इसी से समझा जा सकता है कि भले ही बालिकाओं की संख्या में वृद्धि हुई हो पर इतनी नहीं कि प्रसन्नता व्यक्त की जा सके।
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            बेटे की चाह में बेटियों को मारते जाना समाज में विसंगतियों को ही पैदा कर रहा है। यह एक तरफ जहाँ लिंगानुपात में जबरदस्त असंतुलन पैदा कर रहा है वहीं दूसरी तरफ अनेक प्रकार की बुराइयों को भी जन्म दे रहा है। ये कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके। पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियां होने से महिला भविष्य में मां बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है। परिणामतः वह आने वाले समय में परिवार के लिए न तो पुत्र ही पैदा कर पाती है और न ही पुत्री। बार-बार गर्भपात करवाने से महिला के गर्भाशय से रक्त का रिसाव होने की आशंका बनी रहती है। बार-बार गर्भाधान और फिर गर्भपात से महिला के शरीर में खून की कमी हो जाती है और अधिसंख्यक मामलों में गर्भवती होने पर अथवा प्रसव के दौरान महिला की मृत्यु इसी वजह से हो जाती है। इसके अतिरिक्त एक सत्य यह भी है कि जिन परिवारों में एक पुत्र की लालसा में कई-कई बच्चियों जन्म ले लेती हैं वहां उनकी सही ढंग से परवरिश नहीं हो पाती है। उनकी शिक्षा, उनके लालन-पालन, उनके स्वास्थ्य, उनके खान-पान पर भी उचित रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके चलते वे कम उम्र में ही मृत्यु की शिकार हो जाती हैं अथवा कुपोषण का शिकार होकर कमजोर बनी रहती हैं।
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            अभी से यह चेतावनी सी देना कि समाज में बच्चियों की संख्या भविष्य में कम होते जाने पर उनके अपहरण की सम्भावना अधिक होगी; ऐसे परिवार जो सत्ता-शक्ति से सम्पन्न होंगे, वे कन्याओं को मण्डप से उठा ले जाकर अपने परिवार के लड़कों के उनका विवाह करवा दिया करेंगे; बालिकाओं की अहमियत बढ़ जायेगी और सम्भव है कि बेटियों के परिवारों को दहेज न देना पड़े बल्कि लड़के वाले दहेज दें आदि कदाचित ठीक-ठीक नहीं जान पड़ता है। इस प्रकार की आशंकायें समाज की मानसिकता पर निर्भर करेंगी कि लगातार कम होती बेटियों के साथ उसका कैसा व्यवहार रहेगा किन्तु यह स्पष्ट है कि वर्तमान में महिला लिंगानुपात जिस स्थिति में है, महिलाओं को, बच्चियों को जिन विषम हालातों का सामना करना पड़ रहा है आने वाला समाज बेटियों के लिए सुखमय तो नहीं ही होगा। बच्चियों के अपहरण, बलात उनको उठाकर ले जाने और विवाह रचाने के अपराध आज भी हो रहे हैं और सरकारी स्तर पर इनको रोकने के कोई भी उपाय नहीं किये जा रहे हैं। इसी तरह आज भी समाज में एकाधिक मामले ही ऐसे आते हैं जिनमें उच्च शिक्षित, नौकरीपेश बेटी का विवाह बिना दहेज के हुआ हो। इसके बाद भी पूर्ण दावे के साथ कहा जा सकता है कि कोई भी कालखण्ड हो, कोई भी समाज हो, महिला लिंगानुपात की स्थिति कैसी भी हो किन्तु बार-बार गर्भपात करवाते रहने से महिला के स्वास्थ्य पर विपरीत असर पड़ेगा, उसकी प्रजनन क्षमता भी नकारात्मक रूप में प्रभावित होगी, उसकी शारीरिक क्षमता में भी गिरावट आयेगी और सम्भव है कि मातृत्व की चाह में उसको मौत तक का सामना करना पड़े।

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            हम भले ही अपनी पीठ इस बात के लिए ठोंक लें कि हम बालिकाओं के प्रति प्रोत्साहन का कार्य कर रहे हैं पर सत्यता यह है कि सिवाय दिखावे के हम कुछ भी नहीं कर रहे हैं। अब दिखावे से बाहर आकर हमें ठोस कदम उठाने होंगे। समाज को इस बारे में प्रोत्साहित करना होगा कि बेटियों के जन्म को बाधित न किया जाये, बेटियों को गर्भ में अथवा जन्म लेने के बाद मारा न जाये। पुत्र लालसा में बेटियों की फौज को खड़े करने से भी समाज को रोकना होगा। समाज के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं को आदर्श रूप में प्रस्तुत करके बच्चियों के साथ-साथ उनके माता-पिता के मन में भी महिलाओं के प्रति आदर-सम्मान का भाव जाग्रत करना होगा। बेटियों को भी वही मूलभूत सुविधाओं की उपलब्धता करवानी होगी जो एक परिवार अपने पुत्र को देने की बात सोचता है। हम सभी को अपने मन से, कर्म से, वचन से बेटियों के प्रति, बच्चियों के प्रति सकारात्मक रवैया अपनाना पड़ेगा और पुत्र लालसा में अंधे होकर बेटियों को मारते लोगों को समझाना होगा कि यदि बेटी को मारोगे तो बहू कहाँ से लाओगे?’ 
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