Sunday, 21 September 2014

बेटियों के लिए जागरूक होना ही होगा



          इंसानी कदम आधुनिकता के साथ अंतरिक्ष की ओर बढ़ते जा रहे हैं किन्तु ‘कन्या भ्रूण हत्या’ जैसा कृत्य उसको आदिमानव सिद्ध करने में लगा है। समाज में बच्चियों की गिरती संख्या से अनेक तरह के संकट, अनेक विषमताओं के उत्पन्न होने का संकट बन गया है। विवाह योग्य लड़कियों का कम मिलना, महिलाओं की खरीद-फरोख्त, जबरन महिलाओं को उठाया जाना, बलात्कार, बहु-पति प्रथा आदि विषम स्थितियों से इतर कुछ बिन्दु ऐसे हैं जिनको नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। समाज में महिलाओं की संख्या कम हो जाने से शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु महिलाओं की खरीद-फरोख्त होना, एक महिला से अधिक पुरुषों के शारीरिक संबंधों के बनने की आशंका, इससे यौन-जनित रोगों के होने की सम्भावना बनती है। चिकित्सा विज्ञान स्पष्ट रूप से बताता है कि लगातार होते गर्भपात से महिला के गर्भाशय पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और इस बात की भी आशंका रहती है कि महिला भविष्य में गर्भधारण न कर सके। पुत्र की लालसा में बार-बार गर्भपात करवाते रहने से गर्भाशय के कैंसर अथवा अन्य गम्भीर बीमारियां होने से महिला भविष्य में माँ बनने की अपनी प्राकृतिक क्षमता भी खो देती है। इसके साथ ही महिला के गर्भाशय से रक्त का रिसाव होने की आशंका भी बनी रहती है, जिसके परिणामस्वरूप महिला के शरीर में खून की कमी होने से अधिसंख्यक मामलों में गर्भवती होने पर अथवा प्रसव के दौरान महिला की मृत्यु हो जाती है। इसके अतिरिक्त एक सत्य यह भी है कि जिन परिवारों में एक पुत्र की लालसा में कई-कई बच्चियों जन्म ले लेती हैं वहाँ उनकी सही ढंग से परवरिश नहीं हो पाती है। उनकी शिक्षा, उनके लालन-पालन, उनके स्वास्थ्य, उनके खान-पान पर भी उचित रूप से ध्यान नहीं दिया जाता है। इसके चलते वे कम उम्र में ही मृत्यु की शिकार हो जाती हैं अथवा कुपोषण का शिकार होकर कमजोर बनी रहती हैं।
सामाजिक प्राणी होने के नाते हर जागरूक नागरिक की जिम्मेवारी बनती है कि वो कन्या भ्रूण हत्या निवारण हेतु सक्रिय रूप से अपना योगदान दे। बेटियों को जन्म देने से रोकने वाली किसी भी प्रक्रिया का समाज में सञ्चालन होने से रोके। हम अपने-अपने परिवार के बुजुर्गों को ये समझाने का काम करें कि किसी भी वंश का नाम बेटियों के द्वारा भी चलता रहता है। उनको महारानी लक्ष्मीबाई, इंदिरा गाँधी का उदहारण देकर समझाना चाहिए। परिवार के इन बुजुर्गों के ये भी बताना होगा कि जिनके बेटे पैदा नहीं हुए उनके कार्यों से उनका नाम आज तक समाज में आदर के साथ लिया जा रहा है। ऐसे उदाहरणों के लिए स्वामी विवेकानंद, सरदार भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, सुभाष चन्द्र बोस, जवाहर लाल नेहरू आदि का नाम लिया जा सकता है। बेटे की चाह रखने वाले इन्हीं परिवारीजनों को समझाना चाहिए कि यदि समाज से बेटियाँ समाप्त हो जाएँगी तो फिर वंश-वृद्धि के लिए पुत्र जन्मने वाली बहू कहाँ से आएगी। हम अपने आसपास की, पड़ोस की, मित्रों-रिश्तेदारों की गर्भवती महिलाओं की जानकारी रखें, उनके बच्चे के जन्मने की स्थिति को स्पष्ट रखें। यदि कोई महिला गर्भवती है तो उसको प्रसव होना ही है (किसी अनहोनी स्थिति न होने पर) इसमें चाहे बेटा हो या बेटी। हम स्वयं में भी जागरूक रहें और स्वयं को और अन्य दूसरे लोगों गर्भस्थ शिशु की लिंग जाँच के लिए प्रेरित न करें। इधर देखने में आया है कि दलालों की मदद से बहुत से लालची और कुत्सित प्रवृत्ति के चिकित्सक अपनी मोबाइल मशीन के द्वारा निर्धारित सीमा का उल्लंघन करके भ्रूण लिंग की जाँच अवैध तरीके से करने निकल पड़ते हैं। हम जागरूकता के साथ ऐसी किसी भी घटना पर, मशीन पर, अपने क्षेत्र में अवैध रूप से संचालित अल्ट्रासाउंड मशीन की पड़ताल भी करते रहें और कुछ भी संदिग्ध दिखाई देने पर प्रशासन को सूचित करें। कई-कई जगह पर वैध रूप से पंजीकृत अल्ट्रासाउंड सेंटर्स द्वारा गर्भपात (कन्या भ्रूण हत्या) करने की घटनाएँ प्रकाश में आई हैं। हम सबका दायित्व बनता है कि इस तरह के सेंटर्स पर भी निगाह रखें। इसी के साथ-साथ जन्मी बच्चियों के साथ होने वाले भेदभाव को भी रोकने हेतु हमें आगे आना होगा। उनके खान-पान, रहन-सहन, पहनने-ओढ़ने, शिक्षा-दीक्षा, स्वास्थ्य-चिकित्सा आदि की स्थितियों पर भी ध्यान देना होगा कि कहीं वे किसी तरह के भेदभाव का, दुर्व्यवहार का शिकार तो नहीं हो रही हैं।
यदि इस तरह के कुछ छोटे-छोटे कदम उठाये जाएँ तो संभव है कि आने वाले समय में बेटियाँ भी समाज में खिलखिलाकर अपना भविष्य संवार सकती हैं। अभी से यह चेतावनी सी देना कि समाज में बच्चियों की संख्या भविष्य में कम होते जाने पर उनके अपहरण की सम्भावना अधिक होगी; ऐसे परिवार जो सत्ता-शक्ति से सम्पन्न होंगे, वे कन्याओं को मण्डप से उठा ले जाकर अपने परिवार के लड़कों के उनका विवाह करवा दिया करेंगे; बालिकाओं की अहमियत बढ़ जायेगी और सम्भव है कि बेटियों के परिवारों को दहेज न देना पड़े बल्कि लड़के वाले दहेज दें आदि कदाचित ठीक-ठीक नहीं जान पड़ता है। यह स्पष्ट है कि वर्तमान में महिला लिंगानुपात जिस स्थिति में है, महिलाओं को, बच्चियों को जिन विषम हालातों का सामना करना पड़ रहा है आने वाला समाज बेटियों के लिए सुखमय तो नहीं ही होगा। समाज के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाओं को आदर्श रूप में प्रस्तुत करके बच्चियों के साथ-साथ उनके माता-पिता के मन में भी महिलाओं के प्रति आदर-सम्मान का भाव जाग्रत करना होगा और पुत्र लालसा में अंधे होकर बेटियों को मारते लोगों को समझाना होगा कि यदि आज बेटी को मारोगे तो कल बहू कहाँ से लाओगे?’
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Wednesday, 10 September 2014

नाली में बहता मानव-भ्रूण : असंवेदनशील समाज, पाशविक मानसिकता



शहर में गंदे पानी का निकास करती नाली; कूड़ा-करकट, गंदगी, अन्य अपशिष्ट को अपने साथ बहाकर ले जाती नाली; सफाई के अभाव में बजबजाती नाली और इसी नाली में बहता मिलता है मानव भ्रूण. उत्तर-प्रदेश के बुन्देलखण्ड भूभाग का जनपद जालौन और उसका जिला मुख्यालय उरई, जहाँ कि जनपद स्तर के सभी प्रशासनिक अधिकारियों के आवास हैं, कार्यालय हैं; सभी बड़े राजनैतिक दलों के नेता-कार्यालय मौजूद हैं; राष्ट्रीय-प्रादेशिक-स्थानीय स्तर के समाचार-पत्रों के कार्यालय यहाँ हैं; इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की उपस्थिति भी यहाँ है, सरकारी, गैर-सरकारी बड़े-बड़े प्रोजेक्ट लेकर समाजसेवा करने वाली नामी-गिरामी गैर-सरकारी संस्थाएं भी यहाँ हैं, इसके बाद भी भ्रूण-हत्या जैसा अपराध होना, भ्रूण के नाली में बहाए जाने जैसी शर्मनाक घटना होना दर्शाता है कि अपराधी किस हद तक अपना मनोबल ऊँचा किये हुए हैं. नाली में भ्रूण मिलने की घटना मानवता को कलंकित करने वाली इस कारण से भी कही जा सकती है क्योंकि जहाँ ये भ्रूण पाया गया है वहाँ शहर के प्रतिष्ठित चिकित्सक का नर्सिंग होम है. समाज में कहीं भी भ्रूण-हत्या जैसी वारदात सामने आने पर प्रथम विचार कन्या भ्रूण हत्या का आता है, कुछ ऐसा ही इस घटना पर भी हुआ.
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नाली में सात माह के मानव भ्रूण की खबर मिलते ही सभी की आशंका कन्या भ्रूण हत्या को लेकर उपजी किन्तु ये उस समय लोगों के आश्चर्य की बात हो गई जबकि उन्हें पता चला कि नाली में मिला मानव भ्रूण बालक है. एकाएक उपजी लहर सी शांत हो गई; मीडिया के लिए स्टोरी नहीं; सामाजिक संस्थाओं के लिए आन्दोलन का मुद्दा नहीं आखिर भ्रूण बालक का है. क्या वाकई ये संवेदनशील मामला नहीं कि एक नर्सिंग होम के पास नाली में बहता हुआ सात माह का मानव भ्रूण मिलता है. सवाल यहाँ उसके बालक या बालिका होने का नहीं, सवाल मानव जाति की मानसिकता का है, मानवता का है. ये किसी तरह का अपराध नहीं है कि एक नर्सिंग होम के पास मानव भ्रूण मिलता है किन्तु इस बात की जाँच अवश्य होनी चाहिए कि आखिर वहाँ ये आया कैसे? ये आसानी से समझने वाली बात है कि इस भ्रूण हत्या में कन्या होना तत्त्व केन्द्र में नहीं है क्योंकि सात माह में किसी भी भ्रूण के लिंग की पहचान सहजता से हो जाती है. स्पष्ट है कि ये मामला कन्या भ्रूण-हत्या से सम्बंधित नहीं है. ऐसी स्पष्ट स्थिति के बाद प्रशासन को और तत्परता से वास्तविकता को सामने लाने का प्रयास करना चाहिए.
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संभव है कि ये मामला किसी अनब्याही माँ से जुड़ा हुआ हो, जिसका सामाजिक दबाव में, पारिवारिक दबाव में उसका गर्भपात करवाया गया हो? ऐसे में भी ये पता करने की आवश्यकता बनती है कि आखिर इस कृत्य में किस चिकित्सक ने मदद की है. ये एक आम शिक्षित व्यक्ति को भी पता है कि सात माह की अवस्था में चिकित्सकीय रूप से गर्भपात संभव-सुरक्षित ही नहीं है. ऐसे में ये जानना और भी आवश्यक हो जाता है कि ऐसा क्यों, कब, कहाँ और किसके द्वारा किया गया?
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एक सम्भावना ये भी बनती है कि ये किसी विवाहित महिला की ‘प्री मैच्योर डिलीवरी’ हो या फिर ‘मिसकैरिज’ जैसी कोई घटना हो जिसके लिए किसी चिकित्सक की मदद ली गई हो. यदि ऐसा है तब भी इस घटना को भुलाने योग्य नहीं माना जा सकता है क्योंकि सम्बंधित स्त्री को चिकित्सकीय सुविधा देने के बाद, उसकी मदद करने के बाद किसी भी चिकित्सक, सम्बंधित नर्सिंग होम आदि की जिम्मेवारी बनती थी कि वे उस भ्रूण का यथोचित निपटान करते. ऐसा न किया जाना और उसे नाली में बहा देना अमानुषिक कृत्य ही कहा जायेगा, जिसके लिए न सही कानूनी किन्तु सामाजिक दंड के भागी सम्बंधित लोग बनते ही हैं.
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समाज में कई बार किसी भीख मांगने वाली महिला के साथ, मानसिक विक्षिप्त महिला के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाये जाने की घटनाएँ, उनके गर्भवती होने की घटनाएँ भी सामने आई हैं. इस मामले में भी संभव है ऐसा ही कुछ हुआ हो और सम्बंधित गर्भवती महिला के साथ समुचित चिकित्सकीय देखभाल के अभाव में ऐसा कुछ हो गया हो. यदि ऐसा भी है तो ये हमारी सामाजिक व्यवस्था पर कलंक है जहाँ किसी भिखारिन, किसी मानसिक विक्षिप्त महिला को हवस का शिकार बना लिया जाता हो. ये कहीं न कहीं प्रशासनिक अक्षमता भी कही जाएगी कि उनके द्वारा आज भी ऐसे लावारिस लोगों को, अनाथ लोगों को संरक्षण, चिकित्सकीय सुविधाएँ दे पाना संभव नहीं हो सका है.
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यहाँ सवाल नाली में सात माह के भ्रूण के बालक या बालिका होने का नहीं है वरन मानव स्वभाव की मानसिकता का है. ये अपने आपमें सम्पूर्ण मानव जाति के लिए, मानवता के लिए शर्म का विषय तो है ही कि आधुनिकता में रचे-बसे समाज में आज भी भ्रूण-हत्याएं हो रही हैं किन्तु ये और भी कलंकित करने वाली घटना है कि एक भ्रूण नाली में बहते पाया जाता है. वास्तविकता क्या है इसे सामने आने में समय लगेगा, कहिये प्रशासनिक लीपापोती में सामने न भी आये किन्तु ये घटना दर्शाती है कि हम मानव आज भी जानवर ही बने हुए हैं. 
डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर 
संयोजक-बिटोली 
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चित्र मीडिया-मित्रों के सहयोग से प्राप्त हुए. चित्रों की वीभत्सता को कम करने के लिए ही इनको एक आवरण प्रदान कर दिया गया है. ये घटना ७ सितम्बर २०१४ की है.